विनय-पत्रिका-119| हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै।He Hari!Kavan Jatan Bhram Bhage| पद संख्या-119 | Vinay Patrika-119


हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै।
देखत, सुनत, बिचारत यह मन, निज सुभाव नहिं त्यागै।।
भावार्थ :- हे हरे! मेरा यह (संसारको सत्, नित्य पवित्र और सुखरूप माननेका) भ्रम किस उपायसे दूर होगा ? देखता है, सुनता है, सोचता है, फिर भी मेरा यह मन अपने स्वभाव को छोड़ता। (और संसार को सत्य सुखरूप मानकर बार-बार विषयों में फँसता है) ।।

भगति-ग्यान-बैराग्य सकल साधन यहि लागि उपाई।
कोउ भल कहउ, देउ कछु, असि बासना न उरते जाई।।
भावार्थ :- भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि सभी साधन इस मनको शान्त करने के उपाय हैं, परन्तु मेरे हृदय से तो यही वासना कभी नहीं जाती कि 'कोई मुझे अच्छा कहे' अथवा 'मुझे कुछ दे।' (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य के साधकों के मनमें भी प्रायः बड़ाई और धन-मान पानेकी वासना बनी ही रहती है)।।

 जेहि निसि सकल जीव सूतहिं तव कृपापात्र जन जागै।
निज करनी बीपरीत देखि मोहिं समुझि महा भय लागै।।
भावार्थ :- जिस (संसाररूपी) रातमें सब जीव सोते हैं उसमें केवल आपका कृपापात्र जन जागता है। किन्तु मुझे तो अपनी करनी को बिलकुल ही विपरीत देखकर बड़ा भारी भय लग रहा है।।

जद्यपि भग्न-मनोरथ बिधिबस, सुख इच्छत, दुख पावै ।
चित्रकार करहीन जथा स्वारथ बिनु चित्र बनावै।।
भावार्थ :-यद्यपि दैववश- प्रारब्ध वश मनुष्य के सारे मनोरथ नष्ट हो जाते हैं, सांसारिक सुख उसके भाग्य में ( पूर्व सुकृति के अभाव से) लिखे ही नहीं गये। तथापि वह सुखों की इच्छा मात्र कर वैसे ही दुःख पाता है जैसे कोई बिना हाथका चित्रकार (केवल मनः कल्पित) चित्रों से अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है और भग्नमनोरथ होकर दुःख पाता है (उसी प्रकार मैं भी भजनसाधनरूप सुकृत किये बिना ही यों ही सुख चाहता हूँ)।।

हृषिकेश सुनि नाउँ जाऊँ बलि, अति भरोस जिय मोरे।
तुलसीदास इंद्रिय-संभव दुख, हरे बनिहिं प्रभु तोरे।।
भावार्थ :-आपका हृषिकेश (इन्द्रियों के स्वामी) नाम सुनकर मैं आपकी बलैया लेता हूँ। मेरे मनमें आपका अत्यन्त भरोसा है। तुलसीदास का इन्द्रियजन्य दुःख आपको अवश्य नष्ट करना ही पड़ेगा।।

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