आत्मनिवेदन-भक्ति bhakti


आत्मनिवेदन-भक्ति

भक्ति ही एक ऐसा साधन है,जिसमे हम सभी सुगमता (आसानी )से कर सकते है(अपने जीवन में उतार सकते हैं )| इस कलिकाल में भक्ति के समान आत्मोद्धार  (आत्म शांति ) के लिए दूसरा कोई सुगम उपाय नहीं है; क्योंकि ज्ञान, योग, तप, यज्ञ आदि इस समय (इस शरीर से) सिद्ध होना बहुत कठिन है 'ईश्वर में अनुराग, प्रेम, होना यही भक्ति है|'
 शास्त्रोंमें भक्ति के भिन्न-भिन्न प्रकारसे अनेक लछण बतलाए गए हैं, किन्तु विचार करनेपर सिद्धांतमें कोई भेद नहीं है | तात्पर्य सबका प्रायः एक ही है कि स्वामी (जिनको हम पूजते, मानते, या जिसमे बिस्वास रखते हैं) जिस भाव या आचरणसे संतुस्त हो, उसी प्रकार का आचरण करना (भाव रखना) ही भक्ति है
श्रीमद्भगवतमें भी प्रहलादजी ने कहा  है -
               श्रवणम कीर्तनम वैष्णो: स्मरणम पादसेवनम |
               अर्चनम वंदनम दास्यम  सख्यमात्मनिवेदनम ||
''भगवान विष्णु के नाम, रूप, गुण, और प्र्भावादिका श्रवण, कीर्तन, और स्मरण तथा भगवान कि चरणसेवा, पुजन और वंदन एवं भगवानमें दासभाव, सखाभाव और अपनेको समपर्ण कर देना- यह नौ प्रकार की भक्ति है |'' इस कलिकाल (कलियुग)में भक्ति को छोड़ कर आत्म शांति, सन्तुस्टि पाने का सुगम एवं सरल दूसरा कोई उपाय नहीं हैं क्यों की भक्ति में कोई बाध्यता नहीं होती है यह  तो श्रद्धा और विस्वास है | 
 श्रीभगवान (जिसमें आपकी श्रद्धा, विश्वास हो)उसके तत्व, रहस्य, प्रभाव,महिमाको समझकर ममता और अहंकाररहित होकर अपने तन-मन-धन-बुद्धि-जनसहित अपने-आपको और अपने सम्पूर्ण कर्मो को शर्द्धा और प्रेमपूर्वक परमात्मा को समर्पण कर देना आत्मनिवेदन-भक्ति है | 
हानी –लाभ,जय–पराजय, यस-अपयस, मान-अपमान, सु:ख-दु:ख आदि की प्राप्तिमें, उन्हें भगवान का भेजा हुआ पुरस्कार मानकर प्रसन्न रहना; कठपुतलिकी भाति भगवान के इच्छानुकूल ही सभ कुछ करना; तन-मन-धन, स्त्री-पुत्र आदि सभी में ममता,मोह और अहंकार(घमंड)का अभाव हो जाना; भगवान के रहस्य और प्रभाव को जाननेके लिए उनके नाम, रूप, गुण, लीलाके श्रवण मनन, कथन, अध्ययन और चिंतनादी में श्रद्धा –भक्तिपूर्वक तन-मन, धन-बुद्धि  आदिको लगा देना; इंद्रिय,मन बुद्धि आदि सभीपार एकमात्र भगवानका ही अधिकार समझना; जिस किसी भी प्रकार से भगवान की सेवा बनती रहे इसीमें आनंद मानना(करना); सब कुछ प्रभुके अर्पण करके स्वाद, शौक, विलास, आराम, भोग,आदि इच्छाका सर्वथा अभाव हो जाना; सर्वत्र, सर्वदा और सर्वथा एक भगवान का ही अनुभव करना, भगवान की इच्छा के बिरुद्ध अतिरिक्त स्वतंत्र कोई इच्छा न करना, भगवान के भरोसे पर सदा निर्भर, निसचिंत और प्रसन्न रहना और भगवान की भक्ति को छोड़कर दूसरा किसी भी साधन का  इच्छा न होना आदि सभी आत्मनिवेदन-भक्ति के प्रकार है|
भगवान के शरणागत प्रेमी भक्तोंका संग-सेवन करने से(रहने से) और उनके द्वारा भगवानके नाम, अवतार, गुण, प्रभाव  आदिका श्रवण और मनन करनेसे(जीवन में उतारने से ) आत्मनिवेदन- भक्ति की प्राप्ति होती है | इस प्रकार जो पुरुष भगवान के प्रति आत्मनिवेदन कर देता है उसके सम्पूर्ण अवगुण ,पाप और दु:खो का नाश हो जाता है|
महाराज परीक्षित श्रीशुकदेवजी से कहते हैं –
सान्निध्यत्ते मनयोगीन पापकतीन महान्त्यपि |
सद्धों नस्यन्ति वै पुंसां वैष्णोरिव सुरेतरा ||
‘जैसे भगवान  विष्णु के सान्निध्यमात्र से तुरंत दौत्यों (पापों)का नाश हो जाता है, वैसे ही महायोगीन (शुकदेव)! साधु-संत के सान्निध्य मात्र से बड़े से बड़े पापसमूह (पापों का) नाश हो जाता हैं'|
हमलोग जब भक्तों की कथा सुनते है तो पाते हैं  की -
'व्याधका का कौन-सा (अच्छा) आचरण था ? ध्रुवका आयु ही क्या था?
 गजेंद्रके पास कौन-सी विद्या थी?
 विदुर कौन से उत्तम जाती के थे?
 कुब्जा में ऐसी क्या सुंदरता थी?
 सुदामा के पास कौन सा धन था?
भक्तिप्रिय माधव तो केवल भक्ति से ही संतुष्ट होते हैं। इसीलिए भक्ति ही ऐक कारण है, जिसके वजह से भगवान ने किसी को गले लगाया, तो किसी के जूठे बेर, तो किसी के घर साग खाया |
यही तो भक्ति का फल है |


श्री सीता राम !

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